एक रूपया व एक ईट

एक रूपया व एक ईट:- अग्र -वैश्य समाज की गौरव गाथा , भाग 19

अग्रोहा में आग्रेय गणराज्य की स्थापना

आज से 5100 वर्ष पूर्व महाराजा अग्रसेन ने अग्रोहा में आग्रेय गणराज्य की नींव डाली थी। उस समय वैश्य जाति 18 कबीलों में बँटी हुई थी। उन सबको महाराजा अग्रसेन ने एक मंच पर लाकर एकत्रित किया तथा अग्रोहा में वैश्य जाति का गणराज्य स्थापित किया और उनको “अग्रवाल” की संज्ञा दी महाराजा अग्रसेन ने ही अग्रवालों के 18 कबीलों को 18 गोत्र प्रदान किये वही अट्ठारह गोत्र अग्रवालों में आज तक विद्यमान हैं।

महाराजा अग्रसेन का महान व्यक्तित्व

महाराजा अग्रसेन जी का व्यक्तित्व बड़ा ही महान था। उनका ऊँचा ललाट तथा लम्बी भुजाएँ, उनका चौड़ा सीना तथा बुलन्द आवाज उनकी चमकीली आँखें तथा काली भौहें, उनके चेहरे पर अपूर्व तेज तथा रौबीला शरीर, उसकी महानता के द्योतक थे। उनका व्यक्तित्व प्रभावूपर्ण और आकर्षक था तथा उससे हमेशा रौब टपकता था। उनकी गहनता और गम्भीरता उनकी दूरदृष्टि का परिचायक थी। तभी वे एक महान आग्रेय गणराज्य की स्थापना करने में सफल हुए। यह उनके चुम्बकीय व्यक्तित्व का ही परिणाम था कि उन्होंने उस समय 18 उपजातियों (कबीलों) में विभक्त वैश्य समुदाय को एक मंच पर लाकर महान साम्राज्य के रूप में प्रतिष्ठापित किया। उनके राज्य में बाहर से कोई भी व्यक्ति आता, उसे एक रूपया और एक ईंट दी जाती थी। अग्रोहा में एक लाख वैश्य परिवार रहते थे। इस प्रकार आगन्तुक व्यक्ति के पास एक लाख ईंट हो जाती थी, जिससे वह अपना मकान बना सकता था तथा एक लाख रूपयों से वह यह थी महाराजा अग्रसेन जी की महान अपना व्यापार चलाता था। यह थी समाजवादी विचारधारा, जो उन्होंने आज से लगभग 5100 वर्ष पूर्व विश्व के सामने प्रस्तुत की दी थी। वास्तव में महाराजा अग्रसेन समाजवाद के सूत्रधार और प्रणेता थे।

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